ऊँ श्री सांईनाथाय नमः
मैं किसी तंग सीढियों पर चढी, उसकेबाद चप्पलें निकाली और दूसरी तरफ से और ऊपर
चढी। फिर थोड़ा नीचे की तरफ उतरी जहाँ पर आदर्श भैयाजी सांईबाबाजी के केसरी कपड़ों में खड़े थे। वहीं पर ब्रह्माजी, विष्णूजी और महेशजी भी बैठे थे। तभी आदर्श भैयाजी ने मेरी ओर इंगित करते हुए त्रिमूर्ति को बताया कि ये मैडम गर्ग हैं और मेरी आँख खुल गई।
एक बार मैं रात में बाबाजी को ध्यान कर सोच रही थी कि मुझ में तो कोई गुण नहीं है न तो भजन ही गाना आता है और न आपकी सेवा ही कर पाती हूँ फिर आपने मुझपर दया
कैसे की। बाबाजी की आवाज़ आती है कि मुझे अकल वाले बच्चे नहीं चाहिये मुझे तो मूर्ख
बच्चे ही चाहिये जो कि पूर्ण रूप से समर्पण भाव से सांईबाबा की भक्ति करें। अगले
सप्ताह जब दरबार में आदर्श भैयाजी के समक्ष बैठी तो वही शब्द उसी आवाज में आदर्श
भैयाजी के मुख से सुनाई पड़े।
एक बार मैं घर में पूजा करने बैठी तो मुझे सांई बाबा की मूर्ति के स्थान पर आदर्श
भैयाजी रुद्राक्ष की माला पहने हुए बैठे दिखाई दिये।
आदर्श भैयाजी ने बम बम का नाम स्मरण करने को दिया था। नाम समरण के दौरन
भगवान भोलेनाथ विभिन्न स्वरूपों मे दिखाई दिये।
मेरे बीमार होने पर आदर्श भैयाजी मुझसे मिलने घर आये। आने पर उन्होनें मुझसे बहुत
सारी बातें की। मुझे बहुत सन्तवना दी और मेरी हिम्मत बढाई। मुझे बहुत अच्छा लगा।
उअनके जाने के बाद मैने ईष्ट देव को मन ही मन उलाहना देते हुये कहा की आप कभी
दर्शन नही देते। तो जवाब आया कि मैं सफेद कपड़ों में आया था किन्तु तुमने मुझे नही
पहचाना। मुझे याद आया कि उअस दिन आदर्श भैयाजी सफेद कुर्ते पजामें में ही आये
थे। याह अहसास होते ही मुझे बहुत प्रसन्नता हुई किन्तु अपने ऊपर गुस्सा भी आया कि
समय रहते पहचान नही पाई।
एक बार हम कुछ लोग आदर्श भैयाजी के साथ अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती साहिब
की दरगाह शरीफ में दर्शनों हेतु गये। दर्शनों के बाद बाहर पेड़ के नीचे बैठे थे। मुझे वहीं
बैठे हुए एसा प्रतीत होता है कि ख्वाजा जी की मज़ार पर बीच में कोई व्यक्ति है, वहाँ पर
गुलाब के फूल हैं और पूरी समाधि पर सफेद फूल हैं। इसके तुरंत बाद मैने देखा कि आदर्श
भैयाजी ने सफेद फूलों का टोकरा खरीदा और हम सभी से मज़ार पर सफेद फूल चढवाये।
अनुभव हुआ कि जो वयक्ति बीच में नजर आये थे वो कोई और नहीं स्वयं भोले भंडारी थे।
एक बार आदर्श भैयाजी ने दक्षिणा नहीं ली। अगले दिन सवेरे तीन सूरदास घर पर आये
और सांईबाबा का नाम ले कर चाय मांगी। चाये पीने के दौरान उन्होने हमसे तीर्थ यात्रा के
लिये उतने ही पैसे मांगे जितने कि मैं और मेरी बहू मिलाकर दक्षिणा के लिये देते थे। एसा
अहसास हुआ कि बाबाजी खुद दक्षिणा के लिये आये थे।
एक बार मेरा बेटा बीमार था किन्तु मैं वहाँ नही जा पा रही थी। रात को सोते में अचानक
मेरी आँख खुली तो मन बहुत बेचैन था किन्तु मन में निरन्तर बाबा का नाम स्मरण चल
रहा था। कुछ समय बाद जब मन शान्त हुआ तो लगभग रात के तीन बजे थे और प्फिर
मेरी आँख लग गई। अगले दिन पता चला कि रात में बेटे की तबीयत ख्राब थी किन्तु
लगभग तीन बजे उसे आराम आ गया था। एसा प्रतीत होता है कि जब याद करो आदर्श
भैयाजी सहायता के लिये तत्पर रहते हैं। उस दिन भी आदर्श भैयाजी ने स्वयं मेरे बेटे कि
देखभाल की।
जिन्हें ढूंढती थी मैं करने को मन की बात
महफिल में आ गये वो अपने नसीब से।
प्रेम लता
नोएडा
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